*कुत्ता पालने वाले निम्न बातों को ध्यान में रखकर ही कुत्ता पालें:-*1. जिसके घर में कुत्ता होता है उसके यहाँ देवता हविष्य (भोजन) ग्रहण नहीं करते ।2. यदि कुत्ता घर में हो और किसी का देहांत हो जाए तो देवताओं तक पहुँचने वाली वस्तुएं देवता स्वीकार नहीं करते, अत: यह मुक्ति में बाधा हो सकता है ।3. कुत्ते के छू जाने पर द्विजों के यज्ञोपवीत खंडित हो जाते हैं, अत: धर्मानुसार कुत्ता पालने वालों के यहाँ ब्राह्मणों को नहीं जाना चाहिए ।4. कुत्ते के सूंघने मात्र से प्रायश्चित्त का विधान है, कुत्ता यदि हमें सूंघ ले तो हम अपवित्र हो जाते हैं ।5. कुत्ता किसी भी वर्ण के यहाँ पालने का विधान नहीं है, कुत्ता प्रतिलोमाज वर्ण संकरों (अत्यंत नीच जाति जो कुत्ते का मांस तक खाती है) के यहाँ ही पलने योग्य है ।6. और तो और अन्य वर्ण यदि कुत्ता पालते हैं तो वे भी उसी नीचता को प्राप्त हो जाते हैं ।7. कुत्ते की दृष्टि जिस भोजन पर पड़ जाती है वह भोजन खाने योग्य नहीं रह जाता ।और *यही कारण है कि जहाँ कुत्ता पला हो वहाँ जाना नहीं चाहिए ।*उपरोक्त *सभी बातें शास्त्रीय हैं* अन्यथा ना लें, *ये कपोल कल्पित बातें नहीं**इस विषय पर कुतर्क करने वाला व्यक्ति यह भी स्मरण रखे कि...**कुत्ते के साथ व्यवहार के कारण* तो *युधिष्ठिर को भी स्वर्ग के बाहर ही रोक दिया गया था ।**घर_मे_कुत्ता_पालने_का_शास्त्रीय_शंका_समाधान**महाभारत में* *महाप्रस्थानिक/स्वर्गारोहण पर्व का अंतिम अध्याय**इंद्र ,धर्मराज* और *युधिष्ठिर संवाद में इस बात का उल्लेख है।**जब युधिष्ठिर ने पूछा* कि *मेरे साथ साथ यंहा तक आने वाले इस कुत्तेको मैं अपने साथ स्वर्ग क्यो नही ले जा ।*
तब *इंद्र ने कहा।* इंद्र उवाचहे राजन कुत्ता पालने वाले के लिए स्वर्ग में स्थान नही है !* ऐसे व्यक्तियों का स्वर्ग में प्रवेश वर्जित है।कुत्ते से पालित घर मे किये गए यज्ञ,और *पुण्य कर्म के फल* को क्रोधवश नामक राक्षस उसका हरण कर लेते है और तो और उस घर के व्यक्ति* जो *कोई दान, पुण्य, स्वाध्याय, हवन* और *कुवा_बावड़ी* इत्यादि बनाने के जो भी पुण्य फल इकट्ठा होता है,* वह *सब घर में कुत्ते की हाजरी और उसकी दृष्टि पड़ने मात्र से निष्फल हो जाता है ।इसलिए कुत्ते का घर मे पालना...*निषिद्ध और वर्जित है।कुत्ते का संरक्षण होना चाहिए ,उसे भोजन देना चाहिए, घर की रोज की एक रोटी पे कुत्ते का अधिकार है इस पशु को कभी प्रताड़ित नही करना चाहिए* और *दूर से ही इसकी सेवा करनी चाहिए* परंतु *घर के बाहर, घर के अंदर नही।* यह *शास्त्र मत है।**अतिथि* और *गाय,* ... *घर के अंदर**कुत्ता, कौवा, चींटी*... घर के बाहर, ही फलदाई होते है।**यह लेख शास्त्र और धर्मावलंबियों के लिए है....आधुनिक विचारधारा के लोग इससे सहमत या असहमत होने के लिए बाध्य नहीं है।*गाय, बूढ़े मातापिता* क्रमशः *दिल, घर, शहर* से *निकलते हुए* *गौशालाओं व वृध्दाश्रम मे पहुंच गए*और *कुत्ते**घर के बाहर* से *घर, सोफे, बिस्तर* से होते हुए *दिल मे पहुंच गए,* ... *यही सांस्कृतिक पतन हैं।*
उपरोक्त पोस्ट बहुधा सोशल मीडिया पर बहुत घूम रहा है..........लगता है कि यह सही है, जिसे महाभारत का सन्दर्भ देकर आपको विश्वास दिलाया जा रहा है ? कुत्ते को हम इतना अपवित्र मानते हैं ? किस और पशु को इतना खराब मानते हैं आप ?
तो सत्यता जानने हेतु प्रारम्भ करते हैं महाभारत से ही -
महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में द्वितीय अध्याय में कथा आती है कि युधिष्ठिर अपने पाँचों भाइयों, कृष्णा (कृष्ण नहीं, वे तो पहले ही विदा ले चुके हैं, कृष्णा अर्थात द्रौपदी) और एक कुत्ते के साथ त्रिविष्टप क्षेत्र में जाते हैं जहाँ एक-एक कर सभी भाई और द्रौपदी मृत हो जाते हैं | मात्र धर्मराज युधिष्ठिर और वह कुत्ता जो उनके साथ-साथ चल रहा है ये दोनों ही बचते हैं |
अब तृतीय अध्याय प्रारम्भ होता है, जिसमें रथ लेकर इन्द्र स्वयं आते हैं और युधिष्ठिर से सशरीर स्वर्ग चलने के लिए कहते हैं |
ततः सन्नादयञ्शक्रो दिवं भूमिं च सर्वशः।लेकिन उत्तर में युधिष्ठिर कहते हैं कि बिना अपने भाइयों के और द्रौपदी के मुझे स्वर्ग जाने की कोई इच्छा नहीं है | इन्द्र बताते हैं कि आपके सभी भाई और द्रौपदी मृत होने के पश्चात स्वर्ग में ही गए हैं, आप सशरीर मेरे साथ स्वर्ग चलो और उन्हें देखो |
रथेनोपययौ पार्थमारोहेत्यब्रवीच्च तम् ।।
इसके बाद युधिष्ठिर बोलते हैं कि यह कुत्ता जो मेरे साथ चल रहा है वह मेरा चिरभक्त है अतः इसे भी मेरे साथ ले चलने की आज्ञा दीजिये, मैं इसके साथ निर्दयता नहीं कर सकता हूँ | वास्तव में यहाँ भी युधिष्ठिर की धर्मज्ञता की एक परीक्षा चल रही है |
अयं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह।
स गच्छेत मया सार्धमानृशंस्या हि मे मतिः।।
इन्द्र धर्मराज को डिगाने के लिए कुत्ते के लिए बोलते हैं -
अमर्त्यत्वं मत्समत्वं च राज-
ञ्श्रियं कृत्स्नां महतीं चैव सिद्धिम्।
संप्राप्तोद्य स्वर्गसुखानि च त्वं
त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति।।
अर्थात आप अब मेरे जैसे (देव) हो गए हैं, सामान्य मनुष्य नहीं रहे अतः इस कुत्ते का परित्याग कर दो, इसमें कोई निर्दयता नहीं है |
लेकिन युधिष्ठिर पुनः प्रतिवाद करते हैं और बोलते हैं कि मेरे आर्य होकर भी आप मुझसे अनार्य कर्म करने को, अर्थात अपने भक्त को परित्याग करने को कह रहे हैं, इससे तो जिस स्वर्ग सुख और ऐश्वर्य की बात आप कर रहे हैं वह न ही मिले तो ठीक है | अब यहाँ इन्द्र मात्र दो श्लोक बोलते हैं जो वास्तव में धर्मराज की परीक्षा के भाग हैं -
१) स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति धिष्ण्य-
मिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति।
ततो विचार्यि क्रियतां धर्मराज
त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति।
२) शुना दृष्टं क्रोधवशा हरन्ति
यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च।
तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व
शुनस्त्यागात्प्राप्स्यसे देवलोकम्।।
स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति - जो कुत्ते के साथ हैं (श्ववतां) वे स्वर्ग में नहीं हैं अर्थात कुत्ते के साथ होने वाले स्वर्ग में नहीं आ सकते | यहां घर में होना कहीं नहीं है, क्योंकि युधिष्ठिर कुत्ते के साथ हैं अतः यही अर्थ लगता है कि इन्द्र कह रहे हैं कि इसके साथ तो स्वर्ग नहीं जा पाओगे |
धिष्ण्यमिष्टापूर्तं क्रोधवशा हरन्ति - क्योंकि क्रोधवश नामक राक्षस उन (श्ववतां) के पुण्यों का हरण कर लेता है |
तो हे धर्मराज ! विचार करो और इस कुत्ते का परित्याग कर (स्वर्ग चलो) इसमें कोई निर्दयता नहीं है |
यहाँ अभी तक घर में कुत्ते को पालने, कुत्ते के अपवित्र होने, घर के बाहर-भीतर कुछ नहीं आया है |
शुना दृष्टं क्रोधवशा हरन्ति यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च - जो पुण्यकर्म किए गए हैं या आहुति दी गई हैं वे कुत्ते के (ये सब) देख लेने पर क्रोधवश नामक राक्षस हर लेता है | इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जो पुण्यकर्म हवन आदि हैं उनके पुण्यों को क्रोधवश हरण कर लेता है, यदि वह कुत्ते को देख ले |
दोनों ही श्लोकों में इन्द्र भरसक प्रयत्न करते हैं कि युधिष्ठिर किसी प्रकार कुत्ते को छोड़ें और सशरीर स्वर्ग चलें | कहते हैं कि तुमने अपने भाई, पत्नी को तो उनके कर्म के अनुसार छोड़ दिया इस कुत्ते को क्यों नहीं छोड़ते हो इसमें तुम्हारी मोहदृष्टि कैसे हो गई है ?
त्यक्त्वा भ्रातॄन्दयितां चापि कृष्णां
प्राप्तो लोकः कर्मणा स्वेन वीर।
श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु
त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुह्यसेऽद्य ।।
परन्तु युधिष्ठिर दोनों के प्रत्युत्तर में प्रतिवाद ही करते हैं और कहते हैं कि अपने भक्त (शरणागत/ आश्रित) को छोड़ना ब्रह्महत्या के समान पाप है मैं अपने सुख के लिए अपने इस भक्त को आश्रित को कैसे छोड़ दूँ ? आगे कहते हैं कि अपने भाइयों और द्रौपदी (जो मृत हो चुके हैं) को मैं जीवित नहीं कर सकता हूँ, उनको मैंने जीवित रहते नहीं छोड़ा है, मृत होने पर ही छोड़ा है | (और आप कह रहे हैं कि अपने इस भक्त को मैं जीवित होने पर भी छोड़ दूँ ?) शरणागत को छोड़ना, स्त्री का वध, ब्राह्मण का धन लूटना, मित्रद्रोह करना इन चारों पापों के समान यह भी पाप है अतः मैं इस कुत्ते को नहीं छोड़ सकता हूँ |
समझिए कि इन्द्र की धर्मराज उपाधि नहीं है, वह उपाधि युधिष्ठिर की ही है |
तद्धर्मराजस्य वचो निशम्य धर्मस्वरूपी भगवानुवाच श्लक्ष्णैर्वाक्यैः संस्तवसंप्रयुक्तैः - और इसी के साथ युधिष्ठिर इस धर्म-परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं और वह कुत्ता अपना रूप त्याग धर्मस्वरूपी भगवान कहते हैं कि
अभिजातोसि राजेन्द्र पितुर्वृत्तेन मेधया।
अनुक्रोशेनि चानेन सर्वभूतेषु भारत।।
पुरा द्वैतवने चासि मया पुत्र परीक्षितः।
पानीयार्थे पराक्रान्ता यत्र ते भ्रातरो हताः।।
भीमार्जुनौ परित्यज्य यत्र त्वं भ्रातरावुभौ।
मात्रोः साम्यमभीप्सन्वै नकुलं जीवमिच्छसि।।
अयं श्वा भक्त इत्येवं त्यक्तो देवरथस्त्वया।
तस्मात्स्वर्गे न ते तुल्यः कश्चिदस्ति नराधिपः।।
अतस्तवाक्षया लोकाः स्वशरीरेण भारत।
प्राप्तोसि भरतश्रेष्ठ दिव्यां गतिमनुत्तमाम्।।
इस सब को जान लेने के बाद भी क्या आपको लगता है कि कुत्ता अपवित्र है, उसे नहीं रखना चाहिए | कम से कम महाभारत के इस सन्दर्भ के आश्रय से तो यह नहीं कहा जा सकता है |
वास्तव में ये फतवा-बुद्धि सनातनी है ही नहीं | हमारे धर्म की गति सूक्ष्मातिसूक्ष्म है, युधिष्ठिर पहले ही द्वैतवन में कह आए हैं - धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् | बड़ा ही गुह्य है यह | पवित्रता-अपवित्रता का बहुत ही महत्व है पर ऐसी झूठी बातें बना कर नहीं | माता-पिता की सेवा भी बड़ा धर्म है, गौपालन भी है परन्तु झूठी कहानी कथा-वाचकों की सी बना कर इनका महत्व बताना निन्दनीय और हेय है | रूद्र के पञ्चम अवतार भैरव हैं जिनका वाहन और अनुचर श्वान है - आत्मवर्णसमोपेतं सारमेय समन्वितम् ॥ वे यज्ञोपवीत धारी भी हैं और श्वान भी रखते हैं | चाणक्य भी श्वान के गुण बताते हैं -
बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रः शीघ्रचेतनम् | प्रभुभक्तश्च शूरश्च षडेते च शुनो गुणाः ||
अतः एक ही लाठी से सभी को नहीं हांका जा सकता है | विभिन्नता, साम्प्रदायिक मतभिन्नता सनातन की अप्रतिम शक्ति है |
कौन कुत्ते को अपवित्र मानता है देखिए समाज में....... किसी जुमे की नमाज पढ़ने जाते या रोजे में रहते को देखिएगा ;)
-अशोकाशात्मज आचार्य अलङ्कार


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