सुभाषित के बहाने
अष्टादशपुराणेषु, व्यासस्य वचनद्वयं ।
परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम् ॥
सामान्य अर्थ नहीं, संकेत और जानकारी दूंगा | अपने आप समझिये, आखिर हमारी ही बड़ी माँ है | 🙏
- एकं, द्वे, त्रीणि, चत्वारि, पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दश....... अब सोचिये अष्टादश क्या हुआ ? द्वयं क्या हुआ ?
- जहां भी शब्द के अंत में "षु" आये, जैसे -पुराणेषु, देशेषु, ब्राह्मणेषु, गृहेषु, एतेषु, नदीषु, वृक्षेषु, बालकेषु, विवाहेषु, रोगेषु तो ये शब्द कि सप्तमी विभक्ति है बहुवचन के लिए, और अर्थ है - शब्द के बहुवचन 'में' जैसे क्रमशः - पुराणों में, देशों में, ब्राह्मणों में, घरों में, इन में, नदियों में, वृक्षों में, बालकों में, विवाहों में, रोगों में इत्यादि |
- अब जिस शब्द के अंत में “स्य” मिले वो शब्द षष्ठी विभक्ति और उसका अर्थ होगा सम्बन्ध “का, की, के” जैसे – रामस्य – राम का, रोगस्य- रोग का, बालकस्य – बालक का, व्यासस्य – व्यास का, रामस्य पुस्तकः – राम की किताब, व्यासस्य वचन – व्यास का वचन, पुस्तकस्य पृष्ठः – पुस्तक का पेज | आशा है समझ आ गया होगा |
- अब श्लोक की पहली पंक्ति दुबारा पढ़िए और अपने आप अर्थ लगाइए |
- अब दूसरी पंक्ति – “आय” जिस शब्द के अर्थ में आये तो समझिये, “के लिए”, चतुर्थी विभक्ति | जैसे – रामाय – राम के लिए (राम को), भैरवाय – भैरव के लिए (भैरव को), वृक्षाय जलं – वृक्ष के लिए जल (वृक्ष को जल), गृहाय – घर के लिए (घर को) | गृहाय धनं – घर के लिए धन, देवाय नमः – देवता को नमस्कार, पुण्याय – पुण्य के लिए, पापाय – पाप के लिए |
- अब दूसरी पंक्ति को पुनः पढ़िए और अर्थ निकालिए | “परपीडन” – अर्थ समझने में ज्यादा देर नहीं लगेगी |
देखिये मुझ से shortcuts की आशा न करिए, तनिक सी मेहनत कीजिये | संस्कृत बड़ी माँ है, आशीर्वाद देगी |