Thursday, March 13, 2025

होली के बारे में आचार्य पं. अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर

 


होली के बारे में आचार्य पं. अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर -

इस को पढ़ कर पता लगेगा कि आज का होली का पर्व कई परम्पराओं का मिश्रण है

1. फाल्गुन की पूर्णिमा मन्वादि कहाती है, अर्थात इस दिन से मन्वन्तर प्रारम्भ होता है ।

2. भविष्य पुराण के अनुसार सत्ययुग में ढुंढा नाम की राक्षसी भगवान शिव से वर पाकर प्रतिदिन बालकों को पीड़ित किया करती थी । भयभीत प्रजा ने राजा रघु से कहा । राजा ने जब पुरोहित से उसके नाश का उपाय पूछा तो पुरोहित ने कहा - "सञ्चयं शुष्ककाष्ठानामुपलानां च कारयेत् । तत्राग्नि विधिवद् हुत्वा रक्षोघ्नैर्मन्त्रविस्तरै । ततः किलकिलाशब्दैस्तालशब्दैर्मनोरमै । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च । तेन शब्देन सा पापा होमेन च निराकृता । भयेन तेन सा रण्डा पलायैल्लजिता सती । मरिष्यति न सन्देहो भस्मीभूता तु पूतना ।"

अर्थात् सूखी लकड़ी और उपलों को इकट्ठा करके उससे रक्षा मंत्रों के साथ विधिवत अग्नि जलाए । फिर मनमानी ध्वनि, ताली, हंसी, किलकारी की ध्वनि करे । उस अग्नि की 3 परिक्रमा करके सभी गाएं और हँसें । इस ध्वनि से वह पापिनी वहाँ से भाग जाएगी और भस्म हो कर मर जाएगी ।

इस परम्परा को हम होलिका दहन के समय देखते हैं, हँसना-गाना, चीखना-चिल्लाना, अपशब्द बोलना इसी इतिहास के रूप हैं ।

3. उपरोक्त में ही आगे आया है कि "ततः प्रभृति लोकेस्मिन् होलिका ख्यातिमागतः । सर्वदुष्टापहो होमः सर्वरोगोपशान्तिदः। क्रियतेस्यां द्विजैः पार्थ तेन सा होलिका स्मृता । अस्यां निशागमे पार्थ संरक्ष्याः शिशवो गृहे । गोमयेनोपलिप्ते च सुचतुष्के गृहाङ्गणे । आकारयैच्छिशुपायान बहुव्यग्रकरान्नरान् । ते काष्ठखङ्गैः संस्पृश्य गीतहास्यकरैः शिशून् । रक्षन्ति तेभ्यो दातव्यं गुडपक्वान्न्मेव च । एवं ढुण्ढेति राक्षस्याः स दोषः प्रशमं व्रजेत् । बालानां रक्षणं कार्यं तस्मात्तस्मिन्निशागमे ।

अर्थात ऐसे ही इस लोक में होलिका प्रसिद्ध है । इस दिन हुआ होम (अग्नि) सभी दुष्टों से रक्षा करने वाला और सभी रोगों से शांति देने वाला है । इस दिन रात्रि के प्रारम्भ में घर में बच्चों को बचाने के लिए घर के आँगन में गोबर से लीप कर चौकोर में अग्नि जलाए और लकड़ी की तलवार को छू कर बच्चों के लिए गीत और हास्य करे । उन्हें मीठे पके अन्न दे तो उनकी रक्षा होती है । इस प्रकार ढुंढा राक्षसी का दोष नहीं होता और वो दूर चली जाती है । इस प्रकार बालकों के लिए सायंकाल में रक्षा का कार्य करे ।

4. इसी क्रम में विष्णु पुराण में हिरण्यकश्यप-कयाधु के पुत्र प्रह्लाद और होलिका की कथा आती है । इसमें भी बालक प्रह्लाद को मारने लिए होलिका प्रपञ्च करती है परन्तु विष्णु कृपा से होलिका जल जाती है और भक्त प्रह्लाद की रक्षा होती है । ढुंढा राक्षसी भी बच्चों को ही पीड़ित करती है तो ये दोनों कथाएं परस्पर जुड़ती हैं ।

5. इस दिन नवसस्येष्टि भी मनाई जाती है, जो कि नई सस्य (फसल) के आने पर अग्नि में उसकी आहुति दे कर इष्टि मनाने की परम्परा है । हविष्यान्न को ही खाना वेदों में बताया गया है । होलिका की अग्नि में नए आए गेंहू की बालियों को भूनना इसी परम्परा का भाग है ।

6. अब इस पर्व की विधि और पूजा कैसे करनी है ?

थ पूजाविधिः - देशकालौ संकीर्त्य "सकुटुम्बस्य मम दुंढाराक्षसीप्रीत्यर्थ‍ं तत्पीडापरिहारार्थं होलिकापूजनमहं करिष्ये" इति संकल्प्य शुष्काणां काष्ठानां गोमय पिंडानां च राशिं कृत्वा वह्विना प्रदीप्य तत्र -

अस्माभिर्भयसंत्रस्तेः कृता त्वं होलिके यतः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ।” इति पूजामन्त्रेण होलिकामावाहयामीत्यावाह्य होलिकायै नमः इति मन्त्रेणासनपाद्यादिषोडशोपचारान्दत्त्वा -

प्रार्थनामन्त्रः - वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च । अतस्त्वं पाहि नो देवि भूते भूतिप्रदा भव” इति प्रार्थयेत्‌ । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च जल्पतु स्वेच्छया लोका निःशंका यस्य यन्मतम्‌ ।

अर्थात् देशकालका स्मरण करके कुटुम्ब सहित मेरे ऊपर दुंढा राक्षसी की प्रीति के लिये और उसको जो कुछ पीड़ा है, उसके नाशके लिये में होलिका का पूजन करता हूं । इस प्रकार संकल्प करके सूखी लकड़ी और कंडा इनकी राशि (ढेर) करके और उसको अग्नि से जलाकर ओर उस जलती हुई में इस मन्त्र से कि, भय से त्रास को प्राप्त हुए हमने हे होलिके !  तुझे रची है, इससे तेरा पूजन करते हें । हे भूते ! तू हमको भूति (धन आदि) दे ।  होलिका को नमस्कार है, मैं होलिका का आह्वान करता हूं । इस प्रकार आह्वान करके फिर होलिकायै नमः इस मन्त्र से आसन, पाद्य आदि षोडश उपचारों को देकर इस मंत्र से प्रार्थना करे कि, हे देवि ! सुरेन्द्र ब्रह्मा, शंकर ये तुझको नमस्कार करते हैं इससे हे देवि ! तू हमारी रक्षा कर और भूति को दे। फिर उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके जिसका जो मत है वह उसी प्रकार गाएं, हंसें, निशंक होकर बोलें और जो मनचाहा हो वह कहें । अगले दिन प्रातः इस होली की भस्म को प्रणाम करे ।

यहाँ 2 -3 बातें और,

पहली "चांडालसूतिकागेहाच्छिशुहारितवह्निना" इसी परम्परा में अग्नि के लिए लकड़ी/ उपले की चोरी का भी विधान है, विशेषकर चांडाल और सोबर वाले घर से लकड़ी/ उपले की चोरी । 

दूसरी बात "गीतवाद्यस्तथा नृत्यै रात्रिः सा नीयते जनैः । तमाग्नि त्रिः परिक्रम्य शब्दैलिंगभगांकितैः। तेन शब्देन सा पापा राक्षसीतृप्तिमाप्नुयात्‌ ।" उस रात्रि को मनुष्य गाना, बजाना, नाचना, इनसे व्यतीत करें । और उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके लिंग ओर भग के वाचक शब्द (अपशब्द/ गालियां) जिनमें हों ऐसे शब्द को उच्चारण करें, क्योंकि, वह पापिनी राक्षसी इन शब्दों से तृप्ति को प्राप्त होती है ।

तीसरी बात "एवं रात्रौ होलिकोत्सवं कृत्वा प्रातः प्रतिपदि यः श्वपचं स्पृष्टा स्नानं कुर्यात्‌ । न तस्यः दुष्कृतं किचित्ताधयो व्याधयोऽपि च ।" अर्थात् इस रात्रिमें होली के उत्सव को करके प्रातःकाल प्रतिपदा को चाण्डाल (भंगी) से स्पर्श करके सचैल (कपड़ों सहित) स्नान कर ले । फिर उस मनुष्य की पाप, आधि वा व्याधि सब निवृत्त हो जाती हैं ।

इत्यलम् !

- आचार्य पं. अलंकार शर्मा

फाल्गुन चतुर्दशी वि. सं. २०८१ (चन्द्रोरगखाक्ष), होलिका दहन पर्व

Saturday, January 25, 2025

अवधानकला : The art and legacy of the focused mind !

Today we are going to know about a mostly forgotten art of Avdhana.

If you don’t know it then imagine a person in centre surrounded by 8 or 10 or even 100 people, asking queries, talking out-of-context matters, asking person to make a poem then and there with a particular world in every line, or make a poem with a fourth given line with absurd or non-sense meaning, make a poem which has a good meaning as well as creates an image like of a lotus, circle, snake etc. Moreover, it is happening at the same time they are trying to disturb the person in the center and also asking to create poems etc. Can you imagine the scenario, with ease ? How Vidyavan and focused that person in the center should be ? This is Avdhana kala. It is still displayed by some of the Avdhanis in Samskrit, Kannada, Telugu languages

There goes a Subhashit :

काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।

व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।

The wise ones spend their time seeking pleasure in the study of poetry and scriptures. The fools spend their time in the pursuit of vices, sleep and quarrel.

If we go in the past, Vamana mentions in the Kavyalankara Sutra Vritti that concentration of mind is Avdhana. The derivative meaning of Avdhana is also concentration. However, in Indian culture, Avdhana is known as an art. Avdhana is an intellectual game. There was an art of Avdhana in India long ago. There are many differences in Avdhana, such as Avdhana to music, Avdhana to literature, Avdhana to dance, Avdhana to yakshas, Avdhana to mathematics, Avdhana to eyes, etc. This distinction was made based on the main theme of Avdhana. In Avdhana, there is the Avdhani and the inquirer. There are many differences according to the number of interrogators, such as eight, ten, twenty four, hundred or thousand

If you understand a little Samskrit and take pleasure in understanding their talks, then you should go through the following video available on YouTube of Ashtavadhani Dr. R. Ganesh.

Ashtavadhan by Dr. R Ganesh (English) -


Ashtavadhan by Dr. R Ganesh (Samskrit) -



Talk on Avadhan by Dr. R. Ganesh in TED-Ex -


Now want to tell you some specific queries for example by interrogators to the Avdhanis- 

निषेधाक्षरी - In this query in poem, a particular letter is asked to be not used, and this could be a series of letters as well.Like someone might ask not to use letter “ग”, while making a pray to the Ganesh.

समस्यापूरणम् - In this query the interrogator, tells a line which mostly has an absurd, nonsense or opposite meaning. This line needs to be used in a poem which makes this given line meaningful.

दत्तपदी - The interrogator gives four words, the Chhand (metre), and the subject of the poem. The Avdhani has to use these words in 4 lines, and create a poem in the same metre with that given meaning.

चित्रबन्ध - In Samskrit poetry Chitrabandh are famous as they create a kind of image with their letters. There are several famous chitrabandhs like - गोमूत्रिका, मुरजबन्धः, सर्वतोभद्रः, पद्मबन्धः, चक्रबन्धः

Now we possibly know what Avdhan is, so referring to a few poems made by Avdhani’s, See how clever and artistically they create these poems then and there.

There was a SamsyaPurti line was give - “सुतोदरस्थो जनको विराजते” has an opposite meaning like the father stays in the son’s stomach. This is self-contradictory, how come father be in son’s stomach…….but the Avdhani used a clever context and made a great poem -

The Samasya (Query) - सुतोदरस्थो जनको विराजते

The Parihar (Answer) -

वने न किञ्चित् लभते स्म भोजनं

तदा स भीमो बहुखिन्नमानसः।

समीक्ष्य कुक्षिं वदति स्म धर्मजं

सुतोदरस्थो जनको विराजते

Meaning : (Referring to the Agyatvaas of Pandavas) In the woods, there was no food, nothing to eat so the Vayuputra “Bhim” gets anxious. Looking at Bhim’s stomach his brother Yudhishthir says - “सुतोदरस्थो जनको विराजते”. As Bhim is Vayuputra, his father is Vayu which is in Bhim’s (son’s) stomach as there was no food and only air in the stomach.

Another one -

The Samasya (Query) - “स्तनवस्त्रं परित्यज्य वधू श्वशुरमिच्छति”. This is really obscene and opposite to our tradition, but Avdhani needs to give a poem and make it sensible. “After removing the cloths covering her breasts, the bride longs for her father-in-law”

The Parihar (Answer) -

हिडिम्बा भीमदयिता निदाघे घर्मपीडिता ।

स्तनवस्त्रं परित्यज्य वधू श्वशुरमिच्छति

Hidimba, the beloved of Bhima, oppressed by heat in summer, longs for her father-in-law (Vayu – the deity of Air) after removing the clothes covering her breasts. Not to mention, Hidimba who lived in the woods/ forests forever, this kind of behaviour is normal.

Saturday, June 12, 2021

कुत्ते के साथ व्यवहार के कारण तो युधिष्ठिर को भी स्वर्ग के बाहर ही रोक दिया गया था ?!?

 

*कुत्ता पालने वाले निम्न बातों को ध्यान में रखकर ही कुत्ता पालें:-*

1. जिसके घर में कुत्ता होता है उसके यहाँ देवता हविष्य (भोजन) ग्रहण नहीं करते ।
2. यदि कुत्ता घर में हो और किसी का देहांत हो जाए तो देवताओं तक पहुँचने वाली वस्तुएं देवता स्वीकार नहीं करते, अत: यह मुक्ति में बाधा हो सकता है ।
3. कुत्ते के छू जाने पर द्विजों के यज्ञोपवीत खंडित हो जाते हैं, अत: धर्मानुसार कुत्ता पालने वालों के यहाँ ब्राह्मणों को नहीं जाना चाहिए ।
4. कुत्ते के सूंघने मात्र से प्रायश्चित्त का विधान है, कुत्ता यदि हमें सूंघ ले तो हम अपवित्र हो जाते हैं ।
5. कुत्ता किसी भी वर्ण के यहाँ पालने का विधान नहीं है, कुत्ता प्रतिलोमाज वर्ण संकरों (अत्यंत नीच जाति जो कुत्ते का मांस तक खाती है) के यहाँ ही पलने योग्य है ।
6. और तो और अन्य वर्ण यदि कुत्ता पालते हैं तो वे भी उसी नीचता को प्राप्त हो जाते हैं ।
7. कुत्ते की दृष्टि जिस भोजन पर पड़ जाती है वह भोजन खाने योग्य नहीं रह जाता ।
और *यही कारण है कि जहाँ कुत्ता पला हो वहाँ जाना नहीं चाहिए ।*
उपरोक्त *सभी बातें शास्त्रीय हैं* अन्यथा ना लें, *ये कपोल कल्पित बातें नहीं*
*इस विषय पर कुतर्क करने वाला व्यक्ति यह भी स्मरण रखे कि...*
*कुत्ते के साथ व्यवहार के कारण* तो *युधिष्ठिर को भी स्वर्ग के बाहर ही रोक दिया गया था ।*
*घर_मे_कुत्ता_पालने_का_शास्त्रीय_शंका_समाधान*
*महाभारत में* *महाप्रस्थानिक/स्वर्गारोहण पर्व का अंतिम अध्याय*
*इंद्र ,धर्मराज* और *युधिष्ठिर संवाद में इस बात का उल्लेख है।*
*जब युधिष्ठिर ने पूछा* कि *मेरे साथ साथ यंहा तक आने वाले इस कुत्ते 🐕‍🦺 को मैं अपने साथ स्वर्ग क्यो नही ले जा ।*
तब *इंद्र ने कहा।* इंद्र उवाच
हे राजन कुत्ता पालने वाले के लिए स्वर्ग में स्थान नही है !* ऐसे व्यक्तियों का स्वर्ग में प्रवेश वर्जित है।
कुत्ते से पालित घर मे किये गए यज्ञ,और *पुण्य कर्म के फल* को क्रोधवश नामक राक्षस उसका हरण कर लेते है और तो और उस घर के व्यक्ति* जो *कोई दान, पुण्य, स्वाध्याय, हवन* और *कुवा_बावड़ी* इत्यादि बनाने के जो भी पुण्य फल इकट्ठा होता है,* वह *सब घर में कुत्ते की हाजरी और उसकी दृष्टि पड़ने मात्र से निष्फल हो जाता है ।
इसलिए कुत्ते का घर मे पालना...*निषिद्ध और वर्जित है।
कुत्ते का संरक्षण होना चाहिए ,उसे भोजन देना चाहिए, घर की रोज की एक रोटी पे कुत्ते का अधिकार है इस पशु को कभी प्रताड़ित नही करना चाहिए* और *दूर से ही इसकी सेवा करनी चाहिए* परंतु *घर के बाहर, घर के अंदर नही।* यह *शास्त्र मत है।*
*अतिथि* और *गाय,* ... *घर के अंदर*
*कुत्ता, कौवा, चींटी*... घर के बाहर, ही फलदाई होते है।*
*यह लेख शास्त्र और धर्मावलंबियों के लिए है....आधुनिक विचारधारा के लोग इससे सहमत या असहमत होने के लिए बाध्य नहीं है।
*गाय, बूढ़े मातापिता* क्रमशः *दिल, घर, शहर* से *निकलते हुए* *गौशालाओं व वृध्दाश्रम मे पहुंच गए*
और *कुत्ते*
*घर के बाहर* से *घर, सोफे, बिस्तर* से होते हुए *दिल मे पहुंच गए,* ... *यही सांस्कृतिक पतन हैं।*

Tuesday, June 1, 2021

वाह छोटे !! वाह..........

वाल्मीकि रामायण में प्रथम बार लक्ष्मण जी के इतने सारे संवाद बालकाण्ड में आते हैं जब वनगमन का प्रसंग आता है -
माता कैकयी ने राजा दशरथ को वर देने को प्रतिज्ञाबद्ध करके अपने दोनों वर श्रीराम को बता दिए हैं - प्रथम भरत का राज्याभिषेक और द्वितीय श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास | राजा दशरथ संज्ञाशून्य अचेत अवस्था में पड़े हैं, बोल भी नहीं पा रहे | श्रीराम, धर्म का निश्चय कर, सहर्ष वनगमन के लिए तैयार हैं | यह सब जानकर सौमित्र लक्ष्मण क्रोधित हैं .......कुछ भी कर गुजरने को कटिबद्ध हैं | अयोध्या के लोग यदि विरोध करते हैं तो उन्हें, भरत यदि विरुद्ध बोलते हैं तो उन्हें, और यहां तक कि वे पिता राजा दशरथ को भी कारागृह में बंदी बनाने और यहां तक कि मारने के लिए तैयार हैं, क्योंकि वे सही नहीं कर रहे हैं श्रीराम के प्रति अधर्माचरण कर रहे हैं |

वे कुपित हैं, उनके बाजू फड़क रहे हैं और क्षत्रियोचित रोष से भरे हुए हैं | वे बड़े भाई श्रीराम को भी समझाते हैं कि आप पीछे के खेल को नहीं समझ रहे हैं और इसे दैव विधि बता रहे हैं -

प्रथम तो मात्र स्त्री (कैकयी) के वचन पर निर्भर हो कर राज्यश्री त्याग कर जाना मुझे (लक्ष्मण) को अच्छा नहीं लगता -

न रोचते ममाप्येतदार्ये यद्राघवो वनम्।
त्यक्त्वा राज्यश्रियं गच्छेत् स्त्रिया वाक्यवशं गतः।।2.21.2।।
O venerable one, I do not like that Rama should go to the forest yielding to the words of a woman and renouncing the welfare of the kingdom.

द्वितीय राजा बूढ़े भी हैं और काम विषयों में संलग्न हैं और (कैकयी द्वारा) भड़काए या अपने नियंत्रण में लिए हुए हैं | ऐसा मनुष्य कुछ भी बोल सकता है तो क्या उनकी बात मान कर राज्यश्री को त्याग कर वन चले जाना चाहिये ? -

विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः।
नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानस्समन्मथः।।2.21.3।।
The king has a perverse nature. He is aged. He is overpowered by passions. He is under the spell of carnal pleasures and is incited (by Kaikeyi). Such a man can speak anything.

न तो मुझे राम का कोई अपराध इसमें दिखता है और ना ही कोई दोष जिसके लिए उन्हें राज्य से निकाल दिया जाए और वनवास दिया जाए और -
नास्यापराधं पश्यामि नापि दोषं तथाविधम्।
येन निर्वास्यते राष्ट्राद्वनवासाय राघवः।।2.21.4।।
I do not see any fault in Rama nor any offence committed by him for which he is exiled from the kingdom.
मुझे तो चाहे मित्र हो या विरोधी, ऐसा कोई नहीं दिखायी देता जो सामने या पीछे उनमें कोई दोष बता सके -
न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः।
स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत्।।2.21.5।।
I do not find anybody in this world, even an adversary or one defeated, who finds fault with him even in his absence.
बिना बात के या अकारण ही कोई अपने पुत्र को छोड़ सकता है, जो स्वयं देवताओं की तरह हो, सीधा हो और शत्रुओं का भी प्रिय हो -
देवकल्पमृजुं दान्तं रिपूणामपि वत्सलम्।
अवेक्षमाणः को धर्मं त्यजेत्पुत्रमकारणात्।।2.21.6।।
With no cause nor concern for righteousness, will any one abandon his son who is nearly equal to god, upright, selfrestrained and loved even by his enemies ?
राजा के ऐसे वाक्यों को जो बाल-सुलभ व्यवहार (बिना विचारे) के कारण दिए गए हैं उस पुत्र को मान लेने चाहिये जो स्वयं उस राजा को ही आदर्श मानता हो -
तदिदं वचनं राज्ञःपुनर्बाल्यमुपेयुषः।
पुत्रः को हृदये कुर्याद्राजवृत्तमनुस्मरन्।।2.21.7।।
Will any son with the ideals of a king in mind accept such words of this king who has entered his chilhood again ?
इससे पहले कि किसी को ये सब पता चले, मेरे साथ राज्य को अपने अधिकार में कर लेना चाहिये -
यावदेव न जानाति कश्चिदर्थमिमं नरः।
तावदेव मया सार्धमात्मस्थं कुरु शासनम्।।2.21.8।।
Before this news is known to any one bring the kingdom under your control with my assistance.
हे राघव ! आपके ऊपर कौन अत्याचार कर सकता है, जब आप यम की तरह खड़े हों और मैं अपना धनुष ले आपकी रक्षा कर रहा होऊँ -
मया पार्श्वे सधनुषा तव गुप्तस्य राघव।
क स्समर्थोऽधिकं कर्तुं कृतान्तस्येव तिष्ठतः।।2.21.9।।
O Rama who can commit excesses on you, when you stand like Yama, god of death, protected by me with my bow?
हे मनुजश्रेष्ठ ! यदि पूरी अयोध्या भी आपके विरुद्ध खड़ी हो जाए तो भी मैं अपने तीखे बाणों से निर्मनुष्य (जनविहीन) कर दूंगा -
निर्मनुष्यामिमां कृत्स्नामयोध्यां मनुजर्षभ।
करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्यदि स्थास्यति विप्रिये।।2.21.10।।
O best of men, if the whole of Ayodhya stands against you I shall depopulate it with my sharp arrows.
जो भी भरत के हिमायती या हितचिंतक हों उन सब का वध कर दूंगा, सज्जनों को भी असम्मान मिलेगा -
भरतस्याथ पक्ष्यो वा यो वाऽस्य हितमिच्छति।
सर्वानेतान्वधिष्यामि मृदुर्हि परिभूयते।।2.21.11।।
I shall slay all of them who support Bharata and those who seek his prosperity. A gentleman is treated with disgrace indeed.
और कैकयी से भड़काए हुए हमारे पिता भी यदि हमारे शत्रु बनते हैं तो उनको भी बांध लेंगे या वध तक कर देंगे -
प्रोत्साहितोऽयं कैकेय्या स दुष्टो यदि नः पिता।
अमित्रभूतो निस्सङ्गं वध्यतां बध्यतामपि।।2.21.12।।
Even if our father instigated by Kaikeyi becomes our enemy, he shall be imprisoned or even slain regardless of our relationship with him.
यदि कोई गुरुजन भी गलत मार्ग पर चलने लगे या सही गलत में अन्तर न कर पाए तो उसे भी दण्ड (अनुशासन) मिलना चाहिये -
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम्।।2.21.13।।
Even a preceptor who follows the unrighteous path and is filled with haughtiness and does not know how to discriminate between good and bad, deserves to be disciplined (punished).
हे माँ (कौसल्या) ! यह निश्चित समझो कि यदि राम जलती हुई आग में या वन में भी जाएंगे तो मैं भी उनके साथ वहाँ जाऊंगा -
दीप्तमग्निमरण्यं वा यदि रामः प्रवेक्ष्यति।
प्रविष्टं तत्र मां देवि त्वं पूर्वमवधारय।।2.21.17।।
O mother rest assured should Rama enter a blazing fire or a forest I must have already entered it.
अब राम उन्हें समझाते हैं और बताते हैं कि यह दैव विधि वक्ष हो रहा है जिससे कैकयी ऐसे वर इस समय माँग रही है और पिता उन्हें देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं | मुझे विरोध नहीं करना है और पिता के कहे को सत्य करना ही मेरा धर्म है |
तब अपने बाहुओं को हाथी के सूँड़ की तरह हिलाते हुए, और नकार में अपनी गर्दन हिलाते हुए अपने भाई राम को देख कर लक्ष्मण बोले -
अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः।
तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम्।।2.23.4।।
अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत्।
Shaking his forearm like an elephant raising its trunk, moving his neck horizontally and vertically and casting a pointed and oblique look at his brother, Lakshmana said:
हे क्षत्रियश्रेष्ठ ! आप ऐसा इसलिए बोल रहे हैं कि आपको भय है कि लोग कहंगे कि यह न मानने पर धर्म को हानि पहुंचेगी | वनवास को मानने की में इतनी शीघ्रता की आवश्यकता नहीं है, आप दैव (भाग्य) की बात कैसे कह रहे हैं कि वही सबसे बलिष्ठ है जबकि ऐसा नहीं है -
अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम्।।2.23.5।।
धर्मदोष प्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया।
कथंह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति।।2.23.6।।
यथा दैवमशौडीरं शौण्डीर क्षत्रियर्षभ।
O Rama, the greatest among the brave kshatriyas you say this because of your fear that (by disobeying father's command) harm will be done to righteousness. This great haste is unwarranted for there is the least apprehension about people's verdict (in favour of exile). How do you, of all persons, speak about destiny as allpowerful in these circumstances when it is powerless?
आप इस असहाय और अशक्त दैव (भाग्य) की बात क्यों कर रहे हैं, आप उन दोनों (राजा दशरथ और कैकयी) पर शंका क्यों नहीं करते हैं ? अरे ये सब उन्होंने ही किया हुआ है (दैव ने नहीं)
किन्नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि।।2.23.7।।
पापयोस्ते कथं नाम तयोश्शङ्का न विद्यते।
Why do you extol this pitiable and powerless destiny? Why don't you doubt those two vicious persons (Dasaratha and Kaikeyi)?
आज सभी मनुष्य के पौरुष और भाग्य (दैव) में कौन बलशाली है ये देखेंगे | आज देवताओं के किए (दैव) और मनुष्य के किए में अन्तर देखेंगे -
द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च।
दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति।।2.23.18।।
Today all will witness the power of destiny and the power of man. The difference between man and destiny will be manifested today.
आज लोग मेरे पौरुष से दैव को पराजित होते देखेंगे जैसे उन्होंने आपके राज्याभिषेक को दैव द्वारा बाधित होते देखा है -
अद्य मत्पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः।
यद्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम्।।2.23.19।।
Today people will see destiny defeated by my valour just as they saw your consecration defeated (obstructed) by destiny.
मैं अपने पौरुष से इस मद से बिगड़ैल निरंकुश हाथी के तरह बिगड़े भाग्य को जो आज सीधा कर दूंगा -
अत्यङ्कुशमिवोद्दामं गजं मदबलोद्धतम्।
प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये।।2.23.20।।
I will make destiny, the elephant, running wild on the strength of the rut, unmanageable (even) by the goad, turn back with my valour.
आज राम का राज्याभिषेक सारे लोकपाल और तीनों लोक भी मिलकर भी नहीं रोक सकते हैं, पिता की तो बात ही क्या है -
लोकपालास्समस्ता स्ते नाद्य रामाभिषेचनम्।
न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनः पिता।।2.23.21।।
All the guardians of the quarters and all the three worlds united cannot prevent the consecration of Rama today, what to speak of our father (king Dasaratha).
जिन लोगों ने मिलकर आपके वनवास के लिए षड्यन्त्र किया है, वे ही 14 साल वनवास में रहेंगे (आप नहीं) -
यैर्निवासस्तवारण्ये मिथो राजन्समर्थितः।
अरण्ये ते निवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा।।2.23.22।।
O king those who, with mutual support banished you to the forest, will themselves dwell in the forest for fourteen years.
इसीलिए आपके राज्याभिषेक को रोक कर भरत को राज्य देने की कैकयी की योजना को मैं भ्रष्ट कर दूंगा -
अहं तदाशां छेत्स्यामि पितुस्तस्याश्च या तव।
अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते।।2.23.23।।
Therefore, I shall frustrate the desire of father and of Kaikeyi who plans the kingdom for her son by obstructing your consecration.
मेरे पुरुषार्थ के आगे दैवबल नहीं ठहर पाएगा, जो भी मेरे पुरुषार्थ के सामने आएगा दुख पाएगा -
मद्बलेन विरुद्धाय न स्याद्दैवबलं तथा।
प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम।।2.23.24।।
Any one who opposes my terrible valour will come to grief. The power of destiny will not cause that much sorrow as my valour will.
जब आप हजारों वर्ष प्रजापालन करके वन को जाओगे तब आपके पुत्र प्रजापालन करेंगे -
ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम्।
आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि।।2.23.25।।
When after ruling the subjects for a thousand years you withdraw into the forest (for yativrata) your sons will rule them.
अपने पुत्रों को पुत्रों की तरह पालन करने के लिए प्रजा देकर राजऋषि जन वन में जाते रहे हैं -
पूर्वं राजर्षिवृत्त्या हि वनवासो विधीयते।
प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत्परिपालने।।2.23.26।।
Leaving their sons to look after the subjects as their own children, the rajarsis in ancient times used to retire into the forest as per practice.
हे राम ! यदि आप इस राज्य को लेने में मेरा पूर्ण सहयोग चाहें तो मैं शपथ लेता हूँ कि मैं आपके राज्य की वैसे ही रक्षा करूंगा जैसे तट समुद्र की रक्षा करते हैं | इसके बिना मैं शूरों के लोक में कैसे जा सकता हूँ ?-
स चेद्राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया।
नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि।।2.23.27।।
प्रतिजाने च ते वीर माऽभूवं वीरलोकभाक्।
राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम्।।2.23.28।।
O righteous one, if you apprehend chaos in the kingdom for want of wholehearted support from the (feudatory) kings then, O my valiant brother, I swear to you, I will protect your kingdom like the shore protecting the ocean. Or else, I shall never attain the afterworld of heroes.
इस सब सामग्री से आपका अभिषेक किया जा सकता है, मैं अकेला ही इन सब राजाओं को अपने पुरुषार्थ से रोकने में सक्षम हूँ -
मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्यापृतो भव।
अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात्।।2.23.29।।
The consecration may be performed with these auspicious materials. I am alone capable of facing these kings with my valour.
ये मेरे दोनों बाहु मात्र मेरे शरीर की शोभा के लिए नहीं हैं, यह धनुष मात्र सजावट के लिए नहीं हैं | यह मेरी तलवार मात्र बाँधने के लिए नहीं है और ये मेरे बाण तरकश में ही रखने के लिए हैं | ये चारों मैंने अपने शत्रुओं के दमन के लिए रखे हैं -
न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे।
नाऽसिराबन्धनार्थाय न शरास्तम्भहेतवः।।2.23.30।।
अमित्रदमनार्थं मे सर्वमेतच्चतुष्टयम्।
These my arms are not intended to enhance the beauty (of my body). This bow is not for decoration. The sword is not for the sake of strapping my waist. The arrows are not meant to be fixed to my quiver. All these four are meant for taming my enemies.
जो भी इसमें मेरा शत्रु बन, वह जिन्दा नहीं बचेगा, मैं अपनी विद्युत की तरह चमकती तलवार से अपने शत्रुओं को खत्म कर दूंगा चाहे वह वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हों -
न चाहं कामयेऽत्यर्थं यस्स्याच्छत्रुर्मतो मम।।2.23.31।।
असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा।
प्रगृहीतेन वै शत्रुं वज्रिणं वा न कल्पये।।2.23.32।।
Any one who turns my enemy will not be allowed to remain alive. Holding my sharpedged sword, lustrous as a flash of lightning, I shall exterminate my enemy even if it were Indra, the bearer of thunder.
मेरी खड्ग से यह पूरी पृथ्वी हाथियों-घोड़ों और योद्धाओं के सूँड़, पैरों, जांघों से भर जाएगी, इस पर चलना और निकालना भी कठिन हो जाएगा -
खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे।
हस्त्यश्वनरहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही।।2.23.33।।
This entire earth will become impenetrable and impassable, scattered with the trunks, thighs and heads of elephants, horses and warriors hacked off with my sword.
मेरी खड्ग से कैट हुए हाथी ऐसे गिरेंगे जैसे बिजली से चमकते हुए बादल या जैसे आग से घिरे हुए पहाड़ -
खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाद्रयः।
पतिष्यन्ति द्विपा भूमौ मेघा इव सविद्युतः।।2.23.34।।
The elephants, struck by the blows of my sword, will fall on earth like mountains engulfed in flames and like clouds with lightning.

जब मैं हाथों में गोध के बने करत्राण (दस्ताने) पहन कर शत्रुओं के सामने धनुष हाथ में ले खड़ा होऊँगा कौन पुरुष मेरी सामने अपने पुरुषार्थ को कह पाएगा -
बद्धगोधाङ्गुलित्राणे प्रगृहीतशरासने।
कथं पुरुषमानी स्यात्पुरुषाणां मयि स्थिते।।2.23.35।।
When I stand before men (enemies) wearing godha and fingerprotector, holding the bow ready, who amongst men will boast of his manliness?
अपने कई शत्रुओं को एक ही बाण से और एक शत्रु को कई बाणों से मारूँगा और हाथियों, घोड़ों को उनके मर्म स्थानों पर निशान लगाऊँगा -
बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहून्जनान्।
विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु।।2.23.36।।
Striking each of my foes with many arrows and many with one arrow, I shall aim them at the vitals of men, horses and elephants.
हे प्रभु ! आज आप देखेंगे कैसे मैं अपने दिव्य अस्त्रों के प्रभाव से राजा दशरथ की प्रभुता हटाता और आपकी प्रभुता स्थापित करता हूँ -
अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति।
राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं तव च प्रभोः।।2.23.37।।
O Lord today you shall see the power of my glorious weapons in depriving the king (Dasaratha) of his authority and establishing your supremacy over the kingdom.
हे राम ! मेरे ये बाहु जिनपर चंदेन के लेप, सोने के बाजूबन्द और धन दान देने और मित्रों की रक्षा के योग्य हैं आज आपके राज्याभिषेक में बाधा बनने वालों को हटा देंगे -
अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च।
वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च।।2.23.38।।
अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः।
अभिषेचनविघ्नस्य कर्तृ़णां ते निवारणे।।2.23.39।।
These arms, O Rama which are fit for sandalwood cream, for wearing armlets, for distributing wealth and for protecting friends, will perform the worthy act of subduing those who are creating obstruction to your consecration.
बताइए कौन शत्रु है जिसको मैं उसके प्राणों से, मित्रों से और यश से रहित कर दूँ | मुझे यज्ञ दीजिए जिससे कि यह पृथ्वी आपके अधिकार में आ जाए, मैं अभी वैसा ही कर देता हूँ, मैं आपका दास हूँ, -
ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यताम्
तवा सुहृत्प्राणयशस्सुहृज्जनैः।
यथा तवेयं वसुधा वशे भवे
त्तथैव मां शाधि तवास्मि किङ्करः।।2.23.40।।
Tell me your enemy who should be deprived of his life, fame and friends. Command me as to how this earth shall come under your control. Now itself I shall do that. I am your servant.

टिप्पणी : हिन्दी विषयवस्तु संस्कृत श्लोकों के आधार पर मेरी स्वयं की है | संस्कृत श्लोक एवं आंग्लभाषा अनुवाद सधन्यवाद https://www.valmiki.iitk.ac.in/ से लिया गया है | Note : Hindi contents are written by me based on the Sanskrit Shloks. The English translation and Sanskrit Shloks are taken with thanks from https://www.valmiki.iitk.ac.in/.

Saturday, February 13, 2021

आइये घोड़ा चलाते हैं ! संस्कृत में !!

अभी विचित्र लग रहा होगा कि घोड़ा चलाएं ? ब्लॉग पर ??

हाँ जी आज घोड़ा चलाएंगे, परन्तु चतुरङ्ग (शतरंज) पर और वह वही भी संस्कृत में 😁

आज से 250 वर्ष पहले शतरंज पर घोड़ा चलाना समस्या थी ! हाँ यदि यह शर्त रखी जाए कि शतरंज के प्रत्येक खाने में घोड़ा अवश्य जाना चाहिए | इसे Knights Tour Problem के नाम से जाना गया | इससे भी बड़ी समस्या यह गणितज्ञों और तार्किकों के लिए थी कि वे विधि बताएं कि ऐसा कैसे हो | यूलर नामक यूरोपीय गणितज्ञ ने इस समस्या का "गणितीय" समाधान लगभग सन 1770 ई. में किया |

अब यदि यह जाए कि शतरंज पर घोड़ा इस प्रकार दौड़ाने के बारे में ज्ञानकारी भारत में संस्कृतज्ञों (गणितज्ञों/ छन्दविदों) को 9वीं शताब्दी में ही थी तो ? आप क्या कहेंगे |  तो आज जानते हैं इसके बारे में -

संस्कृत साहित्य में एक मनोरञ्जक चलन था/ है, जिसको चित्रबन्ध या चित्रकाव्य कहा जाता है | इसमें किसी चित्र की भाँती अक्षर सजे होते हैं और उनसे एक सार्थक छन्द बनता है | ये चित्र कभी सर्प जैसे, कभी कमलवत और कभी किसी और प्रकार के होते हैं | तो भाई कुछ महान विद्वानों ने अपनी विद्वत्ता से इस घोड़ा चालन (Knights Tour Problem) का ही चित्रबन्ध बना डाला | रुद्रट नाम के महान विद्वान ने (जिनका समय लगभग ९वीं शताब्दी माना जाता है) "काव्यालङ्कार" नामक ग्रन्थ में एक छन्द लिखा -

सेना लीलीलीना नाली लीनाना नानालीलीली ।
नालीनालीले नालीना लीलीली नानानानाली ॥

और यह न समझें कि इसका कोई अर्थ नहीं है, वह है और यह इस घोड़ाचालन समस्या का हल भी देता है | रुद्रट के इस छन्द का उदाहरण मैंने मात्र समय को बताने लिए किया है, कि कितने पुराने समय में इसका हल एक मनोरञ्जक और विद्वत्ता के चामत्कारिक छन्द में लिखा गया था |

अब मैं बात करना चाहता हूँ संस्कृत आकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र श्री वेदान्त देशिक के एक काव्य ग्रन्थ "पादुका सहस्रम्" की | कहा जाता है कि इसको उन्होंने मात्र एक रात्रि में लिखा था और इसके प्रत्येक पद का एकमात्र लक्ष्य श्री रङ्गनाथ जी की चरण पादुका का गुणगान करना है | इसी ग्रन्थ में 2 छन्द ऐसे आते हैं जो कि इस घोड़ाचालन समस्या का हल देते हैं 👍

यहाँ यह भी बता देना उपयुक्त होगा कि बहुधा हम संस्कृत में लिखे हर छन्द को "श्लोक" कह देते हैं, परन्तु श्लोक (या अनुष्टुप) वास्तव में एक विशेष छन्द हैं और ये बहुत प्रकार के हैं यथा इन्द्रवज्रा, भुजङ्ग, शार्दूल विक्रीड़ित इत्यादि | तो श्लोक छन्द में चार चरण होते हैं प्रत्येक चरण में 8 मात्रा, अर्थात कुल 32 मात्रा | शतरंज में कुल 64 घर होते हैं तो श्लोक छन्द में इसका समाधान होना उचित ही है |

तो अब यह छन्द देखते हैं, जो पादुका सहस्रम् के 30वें अध्याय, चित्रपद्धति के क्रमशः 19 और 20वें और इस  ग्रन्थ के 929 और 930वें छन्द हैं (चतुरङ्ग तुरङ्ग पद बन्धनम्)-

स्थिरागसां सदाराध्या विहताकततामता  ।
सत्पादुके सरासामा रङ्गराजपदं नय 
                                                                               - ॥ ३०.१९॥ ९२९॥

स्थिता समयराजपत्पा गतरामादके गवि ।
दुरंहसां सन्नतादा साध्या तापकरासरा ॥ 
                                                                                 -॥ ३०.२०॥ ९३०॥

अर्थ :

हे सत् पादुका कृपया मुझे भगवान् रंगराज के चरणों तक ले चलो | आप ही पापों से लदे पापियों के द्वारा पूज्य (विहित) हो, आप ही उनके पापों को नष्ट करती हो |
जब आप चलती हो तब आपकी बड़ी आनन्द दायक ध्वनि होती है और आप के चलने से पापियों के पाप को नष्ट करने वाली हो |

अब देखते हैं कि यह घोड़ाचालन समस्या का समाधान कैसे देते हैं | 

1. सबसे पहले 8 X 4 के खाँचों में श्लोक 929 के एक-एक अक्षर को एक-एक घर में रख देते हैं |
(घर क्रमांक काले अंकों में लिखे हैं और श्लोक के अक्षर लाल में लिखे हैं)
2. अब श्लोक 930 के अक्षरों के क्रम के अनुसार घोड़े की ढाई चाल के अनुसार इसमें चलाते हैं | (घोड़े के चलने के क्रमांक नीले अंकों में लिखे हैं)

घोड़े की प्रथम 10 चालें तीर से भी अंकित की गई हैं |


यहाँ तक पढ़ते-पढ़ते स्यात् स्पष्ट हो गया होगा कि कैसे श्रीरङ्गम के रङ्गनाथ जी की चरणपादुका वन्दना में लिखा हुआ एक श्लोक इस अश्वचालन समस्या का समाधान बड़े साधारण और मनोरञ्जक प्रकार के चित्रकाव्य से देता है |

जयतु संस्कृतम् ! जयतु भारतम् !!