Thursday, March 13, 2025

होली के बारे में आचार्य पं. अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर

 


होली के बारे में आचार्य पं. अलंकार शर्मा द्वारा शास्त्रोचित परम्परा पर -

इस को पढ़ कर पता लगेगा कि आज का होली का पर्व कई परम्पराओं का मिश्रण है

1. फाल्गुन की पूर्णिमा मन्वादि कहाती है, अर्थात इस दिन से मन्वन्तर प्रारम्भ होता है ।

2. भविष्य पुराण के अनुसार सत्ययुग में ढुंढा नाम की राक्षसी भगवान शिव से वर पाकर प्रतिदिन बालकों को पीड़ित किया करती थी । भयभीत प्रजा ने राजा रघु से कहा । राजा ने जब पुरोहित से उसके नाश का उपाय पूछा तो पुरोहित ने कहा - "सञ्चयं शुष्ककाष्ठानामुपलानां च कारयेत् । तत्राग्नि विधिवद् हुत्वा रक्षोघ्नैर्मन्त्रविस्तरै । ततः किलकिलाशब्दैस्तालशब्दैर्मनोरमै । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च । तेन शब्देन सा पापा होमेन च निराकृता । भयेन तेन सा रण्डा पलायैल्लजिता सती । मरिष्यति न सन्देहो भस्मीभूता तु पूतना ।"

अर्थात् सूखी लकड़ी और उपलों को इकट्ठा करके उससे रक्षा मंत्रों के साथ विधिवत अग्नि जलाए । फिर मनमानी ध्वनि, ताली, हंसी, किलकारी की ध्वनि करे । उस अग्नि की 3 परिक्रमा करके सभी गाएं और हँसें । इस ध्वनि से वह पापिनी वहाँ से भाग जाएगी और भस्म हो कर मर जाएगी ।

इस परम्परा को हम होलिका दहन के समय देखते हैं, हँसना-गाना, चीखना-चिल्लाना, अपशब्द बोलना इसी इतिहास के रूप हैं ।

3. उपरोक्त में ही आगे आया है कि "ततः प्रभृति लोकेस्मिन् होलिका ख्यातिमागतः । सर्वदुष्टापहो होमः सर्वरोगोपशान्तिदः। क्रियतेस्यां द्विजैः पार्थ तेन सा होलिका स्मृता । अस्यां निशागमे पार्थ संरक्ष्याः शिशवो गृहे । गोमयेनोपलिप्ते च सुचतुष्के गृहाङ्गणे । आकारयैच्छिशुपायान बहुव्यग्रकरान्नरान् । ते काष्ठखङ्गैः संस्पृश्य गीतहास्यकरैः शिशून् । रक्षन्ति तेभ्यो दातव्यं गुडपक्वान्न्मेव च । एवं ढुण्ढेति राक्षस्याः स दोषः प्रशमं व्रजेत् । बालानां रक्षणं कार्यं तस्मात्तस्मिन्निशागमे ।

अर्थात ऐसे ही इस लोक में होलिका प्रसिद्ध है । इस दिन हुआ होम (अग्नि) सभी दुष्टों से रक्षा करने वाला और सभी रोगों से शांति देने वाला है । इस दिन रात्रि के प्रारम्भ में घर में बच्चों को बचाने के लिए घर के आँगन में गोबर से लीप कर चौकोर में अग्नि जलाए और लकड़ी की तलवार को छू कर बच्चों के लिए गीत और हास्य करे । उन्हें मीठे पके अन्न दे तो उनकी रक्षा होती है । इस प्रकार ढुंढा राक्षसी का दोष नहीं होता और वो दूर चली जाती है । इस प्रकार बालकों के लिए सायंकाल में रक्षा का कार्य करे ।

4. इसी क्रम में विष्णु पुराण में हिरण्यकश्यप-कयाधु के पुत्र प्रह्लाद और होलिका की कथा आती है । इसमें भी बालक प्रह्लाद को मारने लिए होलिका प्रपञ्च करती है परन्तु विष्णु कृपा से होलिका जल जाती है और भक्त प्रह्लाद की रक्षा होती है । ढुंढा राक्षसी भी बच्चों को ही पीड़ित करती है तो ये दोनों कथाएं परस्पर जुड़ती हैं ।

5. इस दिन नवसस्येष्टि भी मनाई जाती है, जो कि नई सस्य (फसल) के आने पर अग्नि में उसकी आहुति दे कर इष्टि मनाने की परम्परा है । हविष्यान्न को ही खाना वेदों में बताया गया है । होलिका की अग्नि में नए आए गेंहू की बालियों को भूनना इसी परम्परा का भाग है ।

6. अब इस पर्व की विधि और पूजा कैसे करनी है ?

थ पूजाविधिः - देशकालौ संकीर्त्य "सकुटुम्बस्य मम दुंढाराक्षसीप्रीत्यर्थ‍ं तत्पीडापरिहारार्थं होलिकापूजनमहं करिष्ये" इति संकल्प्य शुष्काणां काष्ठानां गोमय पिंडानां च राशिं कृत्वा वह्विना प्रदीप्य तत्र -

अस्माभिर्भयसंत्रस्तेः कृता त्वं होलिके यतः । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ।” इति पूजामन्त्रेण होलिकामावाहयामीत्यावाह्य होलिकायै नमः इति मन्त्रेणासनपाद्यादिषोडशोपचारान्दत्त्वा -

प्रार्थनामन्त्रः - वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च । अतस्त्वं पाहि नो देवि भूते भूतिप्रदा भव” इति प्रार्थयेत्‌ । तत्राग्निं त्रिः परिक्रम्य गायन्तु च हसन्तु च जल्पतु स्वेच्छया लोका निःशंका यस्य यन्मतम्‌ ।

अर्थात् देशकालका स्मरण करके कुटुम्ब सहित मेरे ऊपर दुंढा राक्षसी की प्रीति के लिये और उसको जो कुछ पीड़ा है, उसके नाशके लिये में होलिका का पूजन करता हूं । इस प्रकार संकल्प करके सूखी लकड़ी और कंडा इनकी राशि (ढेर) करके और उसको अग्नि से जलाकर ओर उस जलती हुई में इस मन्त्र से कि, भय से त्रास को प्राप्त हुए हमने हे होलिके !  तुझे रची है, इससे तेरा पूजन करते हें । हे भूते ! तू हमको भूति (धन आदि) दे ।  होलिका को नमस्कार है, मैं होलिका का आह्वान करता हूं । इस प्रकार आह्वान करके फिर होलिकायै नमः इस मन्त्र से आसन, पाद्य आदि षोडश उपचारों को देकर इस मंत्र से प्रार्थना करे कि, हे देवि ! सुरेन्द्र ब्रह्मा, शंकर ये तुझको नमस्कार करते हैं इससे हे देवि ! तू हमारी रक्षा कर और भूति को दे। फिर उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके जिसका जो मत है वह उसी प्रकार गाएं, हंसें, निशंक होकर बोलें और जो मनचाहा हो वह कहें । अगले दिन प्रातः इस होली की भस्म को प्रणाम करे ।

यहाँ 2 -3 बातें और,

पहली "चांडालसूतिकागेहाच्छिशुहारितवह्निना" इसी परम्परा में अग्नि के लिए लकड़ी/ उपले की चोरी का भी विधान है, विशेषकर चांडाल और सोबर वाले घर से लकड़ी/ उपले की चोरी । 

दूसरी बात "गीतवाद्यस्तथा नृत्यै रात्रिः सा नीयते जनैः । तमाग्नि त्रिः परिक्रम्य शब्दैलिंगभगांकितैः। तेन शब्देन सा पापा राक्षसीतृप्तिमाप्नुयात्‌ ।" उस रात्रि को मनुष्य गाना, बजाना, नाचना, इनसे व्यतीत करें । और उस अग्नि की तीन परिक्रमा करके लिंग ओर भग के वाचक शब्द (अपशब्द/ गालियां) जिनमें हों ऐसे शब्द को उच्चारण करें, क्योंकि, वह पापिनी राक्षसी इन शब्दों से तृप्ति को प्राप्त होती है ।

तीसरी बात "एवं रात्रौ होलिकोत्सवं कृत्वा प्रातः प्रतिपदि यः श्वपचं स्पृष्टा स्नानं कुर्यात्‌ । न तस्यः दुष्कृतं किचित्ताधयो व्याधयोऽपि च ।" अर्थात् इस रात्रिमें होली के उत्सव को करके प्रातःकाल प्रतिपदा को चाण्डाल (भंगी) से स्पर्श करके सचैल (कपड़ों सहित) स्नान कर ले । फिर उस मनुष्य की पाप, आधि वा व्याधि सब निवृत्त हो जाती हैं ।

इत्यलम् !

- आचार्य पं. अलंकार शर्मा

फाल्गुन चतुर्दशी वि. सं. २०८१ (चन्द्रोरगखाक्ष), होलिका दहन पर्व