अभी विचित्र लग रहा होगा कि घोड़ा चलाएं ? ब्लॉग पर ??
हाँ जी आज घोड़ा चलाएंगे, परन्तु चतुरङ्ग (शतरंज) पर और वह वही भी संस्कृत में 😁
आज से 250 वर्ष पहले शतरंज पर घोड़ा चलाना समस्या थी ! हाँ यदि यह शर्त रखी जाए कि शतरंज के प्रत्येक खाने में घोड़ा अवश्य जाना चाहिए | इसे Knights Tour Problem के नाम से जाना गया | इससे भी बड़ी समस्या यह गणितज्ञों और तार्किकों के लिए थी कि वे विधि बताएं कि ऐसा कैसे हो | यूलर नामक यूरोपीय गणितज्ञ ने इस समस्या का "गणितीय" समाधान लगभग सन 1770 ई. में किया |
अब यदि यह जाए कि शतरंज पर घोड़ा इस प्रकार दौड़ाने के बारे में ज्ञानकारी भारत में संस्कृतज्ञों (गणितज्ञों/ छन्दविदों) को 9वीं शताब्दी में ही थी तो ? आप क्या कहेंगे | तो आज जानते हैं इसके बारे में -
संस्कृत साहित्य में एक मनोरञ्जक चलन था/ है, जिसको चित्रबन्ध या चित्रकाव्य कहा जाता है | इसमें किसी चित्र की भाँती अक्षर सजे होते हैं और उनसे एक सार्थक छन्द बनता है | ये चित्र कभी सर्प जैसे, कभी कमलवत और कभी किसी और प्रकार के होते हैं | तो भाई कुछ महान विद्वानों ने अपनी विद्वत्ता से इस घोड़ा चालन (Knights Tour Problem) का ही चित्रबन्ध बना डाला | रुद्रट नाम के महान विद्वान ने (जिनका समय लगभग ९वीं शताब्दी माना जाता है) "काव्यालङ्कार" नामक ग्रन्थ में एक छन्द लिखा -
नालीनालीले नालीना लीलीली नानानानाली ॥
और यह न समझें कि इसका कोई अर्थ नहीं है, वह है और यह इस घोड़ाचालन समस्या का हल भी देता है | रुद्रट के इस छन्द का उदाहरण मैंने मात्र समय को बताने लिए किया है, कि कितने पुराने समय में इसका हल एक मनोरञ्जक और विद्वत्ता के चामत्कारिक छन्द में लिखा गया था |
अब मैं बात करना चाहता हूँ संस्कृत आकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र श्री वेदान्त देशिक के एक काव्य ग्रन्थ "पादुका सहस्रम्" की | कहा जाता है कि इसको उन्होंने मात्र एक रात्रि में लिखा था और इसके प्रत्येक पद का एकमात्र लक्ष्य श्री रङ्गनाथ जी की चरण पादुका का गुणगान करना है | इसी ग्रन्थ में 2 छन्द ऐसे आते हैं जो कि इस घोड़ाचालन समस्या का हल देते हैं 👍
यहाँ यह भी बता देना उपयुक्त होगा कि बहुधा हम संस्कृत में लिखे हर छन्द को "श्लोक" कह देते हैं, परन्तु श्लोक (या अनुष्टुप) वास्तव में एक विशेष छन्द हैं और ये बहुत प्रकार के हैं यथा इन्द्रवज्रा, भुजङ्ग, शार्दूल विक्रीड़ित इत्यादि | तो श्लोक छन्द में चार चरण होते हैं प्रत्येक चरण में 8 मात्रा, अर्थात कुल 32 मात्रा | शतरंज में कुल 64 घर होते हैं तो श्लोक छन्द में इसका समाधान होना उचित ही है |
तो अब यह छन्द देखते हैं, जो पादुका सहस्रम् के 30वें अध्याय, चित्रपद्धति के क्रमशः 19 और 20वें और इस ग्रन्थ के 929 और 930वें छन्द हैं (चतुरङ्ग तुरङ्ग पद बन्धनम्)-
अर्थ :
जब आप चलती हो तब आपकी बड़ी आनन्द दायक ध्वनि होती है और आप के चलने से पापियों के पाप को नष्ट करने वाली हो |
यहाँ तक पढ़ते-पढ़ते स्यात् स्पष्ट हो गया होगा कि कैसे श्रीरङ्गम के रङ्गनाथ जी की चरणपादुका वन्दना में लिखा हुआ एक श्लोक इस अश्वचालन समस्या का समाधान बड़े साधारण और मनोरञ्जक प्रकार के चित्रकाव्य से देता है |

वाह, अद्भुत है।
ReplyDeleteजयतु जयतु संस्कृत भाषा ।👌👌
ReplyDeleteअद्भुत
ReplyDeleteअद्भुत
ReplyDelete🙏
ReplyDeleteजयतु संस्कृतम 🙏
ReplyDeleteवाह जी वास्तव में अद्भुत है, जय हो।
ReplyDeleteWah ji kya baat hai
ReplyDeleteवाह क्या बात है । उत्तम। अतिउत्तम
ReplyDeleteसेना लीलीलीना नाली लीनाना नानालीलीली।
ReplyDeleteनालीनालीले नालीना लीलीली नानानानाली।।
श्लोक का हिन्दी अर्थ क्या होता है, कृपया स्पष्ट करें ।
अति उत्तम अदभुत🙏🙏🚩
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