Thursday, August 4, 2011

सुभाषितानि नीति सूत्रायच !! Post-1

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् ॥

बहुत समय से सोच रखा था कि एक ब्लाँग ऐसा लिखा जाये, जिसमें जितनी संस्कृत मैं जानता हूँ (वैसे विशेष नहीं), जो सुना है, पढा है, वो सब एक जगह संकलित करूँ । इन में से अधिकतर बचपन में रटे हुए थे, और आज भी ज्यों की त्यों लिख सकता हूँ । आज डाँक्टर साब का एक श्लोक फ़ेसबुक पर देख कर एक दम से रुका नहीं गया और ये ब्लाँग बना डाला । जब बन गया है तो लिखा तो जायेगा ही....तो शुरुआत डाँक्टर साब के श्लोक से ही......

१. आचार्यात् पादमादते पादं शिष्यः स्वमेधया । पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च ॥

A student learns a quarter from teacher, a quarter from own intelligence, a quarter from fellow students, and the rest in course of time.

एक पाद शिक्षा आचार्य से, एक पाद शिष्य की अपनी मेधा से; एक पाद अपने जैसे ब्रह्मचारियों से और एक पाद शिक्षा समय के साथ मिलती है ।

यहाँ पाद से अर्थ Quadrant (वृत्त के चतुर्थ) भाग से है ।

२. जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥


- हितोपदेश, सुहृद्भेद

With each drop of water the pitcher gradually gets filled. Similarly knowledge, merit and wealth are acquired.

जल की बूँदें गिरने से जैसे धीरे-धीरे घडा भर जाता है; उसी प्रकार, सभी विद्या, गुण-धर्म और सम्पदा धीरे-धीरे अर्जित होती हैं ।

३. विवाहात पूर्वं नेत्रे आवृते कुरु तत्पश्चात अर्धावृतं कुरु ।

Before marriage, keep your eyes fully open, after marriage keep them half open only.

विवाह से पहले अपनी आँखें पूरी खुली और विवाह के बाद आधी खुली रखो ।

४. उद्यमेन हि सिद्ध्यंति कार्याणि न मनोरथै । नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा : ॥

Jobs are done only by taking actions not by just wish, animals will not become food for the sleeping Lion.

प्रयत्न करने से ही कार्य पूरा होता है न कि चाहने मात्र से, सोते हुए शेर के मुँह में अपने आप (भोजन बन कर) जानवर नहीं घुसते ।

५. अपि स्वर्णमयी लंका न मे रोचते लक्ष्मण । जननि जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि ॥

Even Lanka is made of gold, it doesn't attract me O Lakshman, (Who gave me birth) my mother birthplace is dearer to me then heaven.

हे लक्ष्मण ! मुझे सोने की लंका भी नहीं लुभाती, जन्म देने वाली जन्मभूमि मेरे लिये स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ है ।

६. प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः । मन्त्रंमूलबलेनान्यो यः प्रियः प्रिय एव सः ॥

People remain dear to us either by receiving gifts or by listening pleasing words. Some other can be made dear by reciting spells but who is genuinely dear to us, He/She will remain close to us (without above said techniques).

कुछ लोग उपहार देने पर प्रिय बनते हैं जबकि कुछ मनोहर बातों से, कुछ अन्य मन्त्रबल से प्रिय बनते हैं, पर जिन्हें आप प्रिय हैं, वो आपके प्रिय ही हैं (बिना कुछ किये ही)



7 comments:

  1. उद्यमेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथै: ।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा: ॥

    Only with industry and effort are works done. Animals never themselve enter lion's mouth.

    keep it up.... Alankar

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  2. Samskrit bhaasha mein koi nayee vastu ka bhi namkaran kiya ja sakta hai. 'Blog' ka bhi koi Samskrit/Hindi shabd hona chahiye.

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