Wednesday, May 20, 2015

संस्कृत तकनीकी ग्रंथों में अंक और संख्या का प्रयोग-2

पिछले ब्लॉग के अंक में हमने देखा कि कैसे संस्कृत में तकनीकी ग्रंथों में अक्षरों का प्रयोग करके अंकों/ संख्याओं को प्रदर्शित किया जाता था |
इस अंक में देखते हैं कि और कौन सा तरीका था संस्कृत तकनीकी ग्रंथों में अंकों/ संख्याओं को दिखाने का :



2. शब्दों से अंक-ज्ञान - इस परम्परा में श्रुति, पुराण कथाओं और प्रचलित लोक प्रतीकों का उपयोग करके अंकों और संख्याओं का अनुमान बताया जाता था | जैसे 1 अंक को दिखाना है तो चन्द्रमा या भूमि शब्द का या इनके पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि चन्द्रमा 1 है और पृथ्वी भी एक है |
मान लीजिये अंक 5 को दिखाना है तो तत्त्व जो की पांच हैं या महाभूत जो कि पांच हैं उनका प्रयोग पद्य में किया जाएगा | संख्या 11 लिखनी है तो रूद्र, ईश (प्राचीन काल में ईश के रूप में रूद्र ही प्रसिद्ध थे) शब्द का प्रयोग करेंगे क्योंकि एकादश (11) रूद्र प्रसिद्द हैं | 3 लिखना है तो गुण (सत, रज, तम) का प्रयोग या अग्नि (अग्नि तीन प्रकार की या तीन मुख वाली कहाती है) का या राम (परशुराम, दशरथनंदन राम और बलराम) का प्रयोग प्रचलित था |
अब एक उदहारण देखते हैं कि यह कैसे प्रयुक्त होता है -

मुहूर्त, शुभ-अशुभ काल के ज्ञान के लिए प्रसिद्द ग्रन्थ मुहूर्त चिंतामणि में एक श्लोक है (शुभाशुभ प्रकरण, श्लोक -8) :


सूर्येशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दा, वेदाङ्गसप्ताश्विगजान्कशैलाः |
सूर्याङ्ग सप्तोरगगोदिगीशा, दग्धा विषाख्याश्च हुताशनाश्च || 8 ||
सूर्यादिवारे तिथयो भवन्ति.......... ............................................|| 9 ||

इसमें मात्र संख्याएं ही लिखी हैं | सन्दर्भ बता दूं कि इस श्लोक में वार और तिथियों के संयोग से तीन प्रकार की तिथियों को बताया गया है - दग्ध, विष और हुताशन
पहले दग्ध को लेते हैं जिसके लिए श्लोकांश है - सूर्येशपञ्चाग्निरसाष्टनन्दा
अन्वय - सूर्य + ईश + पञ्च + अग्नि + रस + अष्ट + नन्द


  1. सूर्य - सूर्य 12 हैं (12 राशियों में भ्रमण करने वाले सूर्य का नाम प्रत्येक राशि में अलग-अलग है), तो इस से द्वादशी तिथि पता लगी | (reference के लिए सूर्य, भानु, रवि, हिरण्यगर्भ, भास्कर, आदित्य, मरीचि, खग, मित्र, पूषा, सविता, अर्क)
  2. ईश - जैसा कि ऊपर बताया, ईश को रूद्र के अर्थ में लेने पर ग्यारह रुद्रों से एकादशी तिथि का होना सिद्ध हुआ |
  3. पञ्च - इस से पांच अंक का बोध होता ही है | तो पञ्चमी तिथि पता लगी |
  4. अग्नि - इस से 3 अंक का भान होता है, क्योंकि अग्नि तीन जिव्हा वाली बताई गयी है | तो तृतीया का पता लगा |
  5. रस - स्वाद 6 हैं, जिन्हें हम जीभ से पहचान सकते हैं तो इस से षष्ठी तिथि का पता लगा - मधुर(मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), तिक्त (तीखा), कटु (कड़वा) और कषाय (कसैला)
  6. अष्ट - सीधे-सीधे आठ के अंक को बताता है | अतः अष्टमी तिथि पता लगी |
  7. नन्द - नन्द वंश के नौ राजा प्रसिद्ध हैं अतः नवमी का भान हुआ |
और सूर्यादिवारे तिथयो भवन्ति से पता लगा की गिनने का क्रम सूर्यवार (रविवार) से होगा | अतः दग्ध तिथियाँ ये हैं - रविवार को द्वादशी, सोमवार को एकादशी, मंगलवार को पञ्चमी, बुधवार को तृतीया, गुरूवार को षष्ठी, शुक्रवार को अष्टमी और शनिवार को नवमी |
इसी प्रकार अन्य दोनों श्लोकांशों से विष और हुताशन तिथियों का पता लग सकता है अपने आप प्रयत्न करें हाँ पौराणिक कथाओं, मान्यताओं का ज्ञान इसके लिए अत्यावश्यक है |
इस प्रकार के श्लोकों के अर्थ में भी वही अङ्कानां वामतो गतिः याद रखना है |


तो कुछ प्रसिद्ध शब्दों के संख्या-अंक प्रयोग बताते चलें फिर उदाहरण देंगे -


अंक/ संख्या
शब्द
0
खं, भू, आकाश, अभ्र (आकाश)
1
भू, चन्द्र, कु, शशि
2
कर (हाथ), अश्विनीकुमार, नेत्र, यम, युग्म, दृशः
3
अग्नि, वह्नि, गुण, अनल, राम
4
वेद, कृताः, सागर, अब्धि
5
शरः, बाण, सुतः, सायकः
6
रस, अंग, तर्क, दर्शन
7
अश्व, अद्रिः, शैलः
8
गजः, वसु, उरगः, नाग
9
अंक, गौ
10
दिक् (दिशा), आशा
11
शिव, रूद्र, ईशः, उग्रः
12
आदित्यः, भानु, सूर्य
13
विश्वः
14
मनु, भूत, इन्द्रः, शक्रः
15
तिथि, पक्ष
16
नृपः, अष्टि
20
नखाः
21
प्रकृतिः
24
जिनः
25
तत्वं
27
नक्षत्र, ऋक्षं
30
अमा
32
रदाः, दशना, दन्ताः



इन सभी प्रयोगों की पीछे की कहानी या उनके नाम बताना असंभव नहीं तो यहाँ कठिन अवश्य है | इसके लिए पुरानी कुछ पुस्तकें भी हैं, मेरे स्वयं के पुस्तकालय में ऐसी एक 80-90 वर्ष पुरानी पुस्तक है जिसमें मात्र संख्या और उस से सम्बंधित शब्द और उनके नाम का उल्लेख है |

अब कुछ उदाहरण पुनः देखते हैं -

मुहूर्त चिंतामणि में ही एक जगह नक्षत्रों में ताराओं की संख्या बताते हुए एक श्लोक है (नक्षत्र प्रकरण, श्लोक-58)
त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नयः शरेषुनेत्राश्विशरेन्दुभूकृताः |
वेदाग्निरुद्राश्वियमाग्निवह्नयोSब्धयः शतंद्विरदाः भतारकाः ||

अन्वय - त्रि (3) + त्रय(3) + अङ्ग(6) + पञ्च(5) +अग्नि(3) + कु(1) + वेद(4) + वह्नय(3); शर(5) + ईषु(5) + नेत्र(2) + अश्वि(2) + शर(5) + इन्दु(1) + भू(1) + कृताः(4) | वेद(4) + अग्नि(3) + रुद्र(11) + अश्वि(2) + यम(2) + अग्नि(3) + वह्नि(3); अब्धयः(4) + शतं(100) + द्वि(2) + द्वि(2) + रदाः(32) + भ + तारकाः ||

यहाँ थोड़ी संस्कृत बता दूं भतारकाः का अर्थ है भ (नक्षत्रों) के तारे | तो यदि नक्षत्रों में तारे अश्विनी नक्षत्र से गिनें तो इतने तारे प्रत्येक नक्षत्र में होते हैं |

अब एक उदाहरण गणितीय सूत्र का लेते हैं -
मुहूर्त चिंतामणि (वास्तु प्रकरण, श्लोक 3) में गृहपिण्डायन (House Plot size determination) की गणना का सूत्र इस श्लोक में है -
एकोनितेष्टर्क्षहता द्वितिथ्यो
रुपोनितेष्टाय हतेन्दुनागैः |


युक्ता घनैश्चापि युता विभक्ता
भूपाश्विभिः शेषमितो हि पिण्डः ||


अन्वयार्थ :
एकोनितेइष्टर्क्ष = इष्ट नक्षत्र की संख्या में से एक निकाल(घटा) कर
हता = गुणा
द्वितिथ्यो = 152 (द्वि=2, तिथि=15 फिर अंकानाम् वामतो गतिः से पहले तिथि(15) फिर द्वि (2)) = 152
रुपोनितेष्टाय हते = इष्ट आय में से एक निकाल(घटा) कर गुणा
इन्दुनागैः = इन्दु (1), नागैः (8) फिर अंकानाम् वामतो गतिः से पहले नाग (8) फिर इंदु (1) = 81
युक्ता = जोड़ो
घनैः = 17
विभक्ता = भाग दो
भूपाश्विभिः = भूप (16), अश्वि (2) फिर अंकानाम् वामतो गतिः से पहले अश्वि(2) फिर भूप (16) = 216
शेषमितो हि पिण्डः = शेष बचा हुआ ही पिण्ड (का क्षेत्रफल) है |

तो सूत्र ये बना -
पिण्ड मान = [{(इष्ट नक्षत्र संख्या - 1) X 152} +{(इष्ट आय -1) X 81} + 17] / 216

इसी प्रकार अन्यान्य ग्रंथों में गणितीय सूत्र या सख्याएं प्रतीक रूप में वर्णित हैं | सूर्य के सात घोड़े सात रंग होंगे इस कल्पना को निरी महामूर्खता मानना क्या अन्याय नहीं है किसी मान्यता के साथ ?

अब सही बताएं क्या आपने किसी श्लोक के बारे में कल्पना की थी कि ये कोई गणितीय सूत्र होगा और ऐसे भी लिखा जा सकता है ? अब यदि आपको कोई ज्योतिष/ प्राचीन विद्याओं का जानकार इन बातों की जानकारी रखने वाला मिले तो उसे निपट गंवार (चूतिया) न समझें और न मानें ऐसी मेरी प्रार्थना है |

मेरे पिताजी की एक कविता के बोल हैं -
सिर्फ लिफाफा देख कर ख़त का मजमूँ
जानने की तहजीब,
एक दिन में नहीं आती,
सालों ख़त बांचने पड़ते हैं........

आज के लिए इतना पर्याप्त है :) |

इत्यलम् !

--  स्व. डॉ. पं. अशोकशर्मात्मजअलंकार


Saturday, May 2, 2015

संस्कृत तकनीकी ग्रंथों में अंक और संख्या का प्रयोग-1

संस्कृत में लिखे ज्योतिष और गणित ग्रंथों में प्रायः अंकों और संख्या को इंगित करने के लिए एक विशेष शैली का प्रयोग किया जाता  है | आज की चर्चा इसी पर आधारित है और इसे कई उदाहरणों से समझेंगे |

अधिकतर संस्कृत ग्रंथों में पद्य का प्रयोग किया जाता रहा है, और छंदों में ही लिखा हुआ है | कई प्रकार के संस्कृत छंद उपलब्ध थे तो छंदों को अंकों और संख्याओं को इन्हीं छंदों में पद्य में ही पिरो दिया जाता था | विषय को जानने वाला उनका सही अर्थ, अंकों और संख्याओं को समझ लेता था |

तो दो तरह से ये काम किया जाता था -
1. अक्षरों से अंक-ज्ञान: (कटपयादि परम्परा)- इस परम्परा में अंकों का ज्ञान अक्षरों से किया जाता था | इसके लिए सूत्र जिसका प्रयोग किया जाता है वो है 
"अवर्गे शून्यं कादि नव टादि नव पादि पञ्च याद्यष्टौ नञ शून्यम्"
अर्थात् नीचे की सारिणी देखें और बायीं ओर से दायीं ओर अक्षरों के समूह के लिए अंक याद रखें -
अंक
वर्ण->
0
लृ
1







2







3







4







5







6








7








8








9









अब एक सूत्र और ध्यान रखें 
"अङ्कानाम् वामतो गतिः"
मतलब अंकों की गति (प्रवाह) बायीं ओर से होता है |

तो यदि आप को शब्द बताया 'काम' तो इसका अर्थ हुआ (ऊपर के सारणी से देखें) क =1, म=5 अब दूसरा नियम 'अङ्कानां वामतो गतिः' तो काम =51

इसी प्रकार शब्द बताया 'कमल' तो अर्थ हुआ क=1, म=5,ल=3; कमल=351
यहाँ ध्यान दें कि मात्राओं का कोई महत्व नहीं है, 'काम' और 'कामी' एक ही हैं |
यही 'अङ्कानां वामतो गतिः' का नियम ही है जिससे एकादश (एक+दश) का मतलब 11, द्वादश (द्वा+दश) का मतलब 12, त्रयोविंशति (त्रि+विंशति) 23 |
अब इस पद्धति का सबसे सुन्दर उदाहरण देखें -


गोपीभाग्यमधुव्रात शृङ्गिशोदधिसन्धिग । 
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर ॥

इस श्लोक का अर्थ है -

गोपियों के भाग्य, मधु (दानव) को मारने वाले, सींग वाले पशुओं (गौओं) के रखवाले, समुद्र में जाने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले, कंधे पर हल रखने वाले और अमृत रखने वाले आप हमारी रक्षा करो |

परन्तु इस श्लोक में कुछ और भी छुपा है जो ऊपर वाली सारणी से निकाला जा सकता है -

गो=3, पी=1, भा=4, ग्य (य)=1, म=5, धु=9, व्रा (र)=2, त=6............

चलते रहें और संख्या लिखते रहें क्या ये संख्या कुछ जानी-पहचानी है ?
3.1415926...... अरे ये तो पाई (PI) का मान है | परन्तु ये 'अङ्कानां वामतो गतिः' को नहीं मानता |

अब यह भी जान लें की यह छंद अनुष्टुप प्रकार का छंद है और यह उसके नियमों का भी पालन करता है | विशिष्टता 1.अनुष्टुप छंद, 2.एक सामान्य अर्थ 2.विशिष्ट अर्थ जिसमें कुछ स्थिर अक्षरों का ही प्रयोग करना है |





यदि ऊपर दिया श्लोक कम पड़ रहा हो तो ये लीजिये माधवाचार्य द्वारा साइन (Trigonometrical Sine) के मानों की सारणी बनाने के लिए एक श्लोक -











श्रेष्ठं नाम वरिष्ठानां हिमाद्रिर्वेदभावनः।
तपनो भानुसूक्तज्ञो मध्यमं विद्धि दोहनं।।
धिगाज्यो नाशनं कष्टं छत्रभोगाशयाम्बिका।
म्रिगाहारो नरेशोऽयं वीरोरनजयोत्सुकः।।
मूलं विशुद्धं नालस्य गानेषु विरला नराः।
अशुद्धिगुप्ताचोरश्रीः शंकुकर्णो नगेश्वरः।।
तनुजो गर्भजो मित्रं श्रीमानत्र सुखी सखे!।
शशी रात्रौ हिमाहारो वेगल्पः पथि सिन्धुरः।।
छायालयो गजो नीलो निर्मलो नास्ति सत्कुले।
रात्रौ दर्पणमभ्राङ्गं नागस्तुङ्गनखो बली।।
धीरो युवा कथालोलः पूज्यो नारीजरैर्भगः।
कन्यागारे नागवल्ली देवो विश्वस्थली भृगुः।।
तत्परादिकलान्तास्तु महाज्या माधवोदिताः।
स्वस्वपूर्वविशुद्धे तु शिष्टास्तत्खण्डमौर्विकाः।।

ये है गृहकार्य हेतु !
फ्यू........अब बाकी अगले अंक में |
-  --  स्व. डॉ. पं. अशोकशर्मात्मजअलंकार

Wednesday, November 12, 2014


31. दुर्जनम् प्रथमं वन्दे, सज्जनं तदनन्तरम्। मुख प्रक्षालनत् पूर्वे गुदा प्रक्षालनम् यथा ॥

First attend the people who are not so good, the the better ones. Like in the morning we wash our face after washing our rear ends :)

पहले कुटिल व्यक्तियों को प्रणाम करना चाहिये, सज्जनों को उसके बाद; जैसे मुँह धोने से पहले, गुदा धोयी जाती है ।



 न भूतपूर्व न कदापि वार्ता हेम्नः कुरंगो न कदापि दृष्टः । तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीत बुद्धिः ॥ 

आयुशः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते |
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ||
Even a single second in life cannot be obtained by alll precious jewels. Hence spending it without purpose is a great mistake.

हरिर्दाता हरिर्भोक्ता हरिरन्नं प्रजापतिः |
हरिः सर्वशरीरस्थो भुङ्क्ते भोजयते हरिः ||

Lord Hari is the Giver. Lord Hari is the enjoyer. Hari is the
food and the Creator. He, while residing in all beings, is the
one who feeds himself as well as the body.

आत्मार्थं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः ।
परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ।।

http://www.orkut.com/Main#CommMsgs?cmm=433042&tid=2484605127238930237

http://sanskritdocuments.org/all_sa/allshlokawmean_sa.html

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ?
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ।।


मीनः स्नानरतः फणी पवनभुक्त मेषस्तु पर्णाश्ने
निराशी खलु चातकः प्रतिदिनं शेते बिले मूषकः ।
भस्मोध्द्वलनतत्परो ननु खरो ध्यानाधिसरो बकः
सर्वे किं न हि यान्ति मोक्षपदवी भक्तिप्रधानं तपः ॥
मीन (मछली) नित्य जल में स्नान करती है, साँप वायु भक्षण करके रहता है; चातक तृषित रहता है, चूहा बिल में रहता है, गधा धूल में भस्मलेपन करता है; बगुला आँखें मूंदके बैठ ध्यान करता है; पर इन में से किसी को भी मोक्ष नहीं मिलता, क्यों कि तप में प्रधान "भक्ति" है ।

आपूर्यमाणमचलप्रातिष्ठं समुद्रमाप: प्राविशन्ति यद्वत् |
तद्वत् कामा यं प्राविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ll
जो व्यक्ती समय समय पर मन में उत्पन्न हुइ आकांशाओं से अविचलित रहता है
और
जैसे अनेक नदीयाें के सागर में मिलने पर भी सागर का जल नहीं बढता एवं वह शांत ही रहता है, 
ऐसे ही व्यक्ती सुखी होते हैं जो हर परिस्थिति में शांत रहते हैं 
(गीता)

यदि वहसि त्रिदण्डं नग्रमुंडं जटां वा
यदि वससि गुहायां पर्वताग्रे शिलायाम् ।
यदि पठसि पुराणं वेदसिध्धान्ततत्वम्
यदि ह्रदयमशुध्दं सर्वमेतन्न किज्चित् ॥ 

आदमी त्रिदंड धारण करे, सर पे मुंडन करे, जटा बढाये, गुफा में रहे या पर्वत की चोटी पर, और वेद पुराण व्र सिद्धान्त के तत्व का अभ्यास करे, लेकिन जो ह्रदय साफ़ न हो तो ये सब बेकार है !


नमोभूषा पूषा कमलवनभूषा मधुकरो
वचोभूषा सत्यं वरविभवभूषा वितरणम् ।
मनोभूषा मैत्री मधुसमयभूषा मनसिजः
सदो भूषा सूक्तिः सकलगुणभूषा च विनयः ॥

सूर्य आकाश का भूषण है, भौंरा कमलवन का, सत्य वाणी का, 
दान श्रेष्ठ वैभव का, मैत्री मन का, कामदेव वसंत का, 
और सद्वचन सभा का भूषण है । 
पर विनय तो सब गुणों का भूषण है ।


मा प्र गाम पथो वयम्। (ऋग्वेद 10/57/1) 

हम राह से बेराह न हों।


बार बार बैल कौ निपट ऊँचो नाद सुनि,
हुंकरत बाघ बिरुझानो रसरेला में |
भूधर भनत ताकी बास पाय शोर करि,
कुत्ता कोतवाल को बगानो बगमेला में |
फुंकरत मूषक को दूषक भुजंग तासों,
जंग करिबेको झुक्यो मोर हधेला में |
आपस में पारषद कहत पुकारी कछु
रारि सी मची है त्रिपुरारि के तबेला में ||

मूसे पर सांप राखै, सांप पर मोर राखै, बैल पर सिंह राखै, वाकै कहा भीती है |
पूतनिकों भूत राखै, भूत कों बिभूति राखै, छमुख कों गजमुख यहै बड़ी नीति है |
कामपर बाम राखै, बिषकों पीयूष राखै, आग पर पानी राखै सोई जग जीती है |
'देविदास' देखौ ज्ञानी संकर की साबधानी, सब बिधि लायक पै राखै राजनीति है |अंग में लगाते हैं सदा से चिता की भस्म,
फिर भी शिव परम पवित्र कहलाते हैं |
गोद में बिठाये गिरिजा को रहते हैं सदा,
फिर भी शिव अखंड योगिराज कहलाते हैं |
घर नहीं धन नहीं, अन्न और भूषण नहीं,
फिर भी शिव महादानी कहलाते हैं |
दिखत भयंकर, पर नाम शिव शंकर,
नाश करते हैं तो भी नाथ कहलाते हैं |


भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥

अर्थात् (प्रातः स्नान के पश्चात्) पार्वती जी भगवान शंकर के मस्तक पर भभूत लगा रही थीं तब थोड़ा सा भभूत झड़ कर शिव जी के वक्ष पर लिपटे हुये साँप की आँखों में गिरा। (आँख में भभूत गिरने से साँप फुँफकारा और उसकी) फुँफकार शंकर जी के माथे पर स्थित चन्द्रमा को लगी (जिसके कारण चन्द्रमा काँप गया तथा उसके काँपने के कारण उसके भीतर से) अमृत की बूँद छलक कर गिरी। वहाँ पर (शंकर जी की आसनी) जो बाघम्बर था, वह (अमृत बूंद के प्रताप से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चलने लगा। सिंह की गर्जना सुनकर गाय का पुत्र - बैल, जो शिव जी का वाहन है, भागने लगा तब गौरी जी मुँह में आँचल रख कर हँसने लगीं मानो शिव जी से प्रतिहास कर रही हों कि देखो मेरे वाहन (पार्वती का एक रूप दुर्गा का है तथा दुर्गा का वाहन सिंह है) से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है।


गुणवन्त: क्लिश्यन्ते प्रायेण भवन्ति निर्गुणा: सुखिन: |
बन्धनमायान्ति शुका यथेष्टसंचारिण: काका: ||

अर्थातः 

गुणवान व्यक्ति को बहुतः कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, 
इससे विपरीत अवगुणी व्यक्ति आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करता है । जैसे तोता अपने गुणों के कारण पिंजरे में क़ैद होता है पर कव्वा स्वछन्द उड़ता रहता है । 


विद्वानेव विजानाति
विद्वज्जनपरिश्रमम्
न हि वन्ध्या विजानाति 
गुर्वीं प्रसववेदनां


दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥

दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें।


रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगाः
निरालम्बो मार्गश्चरणरहितः सारथिरपि ।
रविर्गच्छत्यन्तं प्रतिदिनमपारस्य नभसः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥

सूर्य के रथ को एक ही पैया है, साँप की लगाम से संयमित किये हुए सात घोडे हैं, आलंबनरहित मार्ग है, बिना पैर का सारथि अरुण है; साधनों की इतनी मर्यादा होने पर भी सूर्य रोज सारे आकाश में घूमता है, क्यों कि महापुरुषों की कार्यसिद्धि, (व्यक्ति के) सत्त्व पर निर्भर करती है, न कि साधनों पर ।

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